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Monday, July 4, 2011

बस सो ही रहे हैं...



आज़ादी,
की लड़ाई की जदो-जहद २०० सालों तक चली,
सायद उसी की थकन हे,
के हम पिछले ६४ सालों से
बस सो ही रहे हैं

इंडिया सब्द के आगे भारत सब्द अब
एक दुसरे देश सा लगता हे,

कोश्ती हे जनता अपने नेताओं को भ्रस्टाचार के नाम पर,
और अपने ही नाकारा बचों के लिए रिश्वत देते इठलाते हैं,
अजब देश हे जहाँ हिंदी बोलने पर
स्कूल में बचे मार खाते हैं।

थकन बहोत हे २०० सालों के गुलामी की
ईसी लिए वोटिंग के दिन को हम
छुटी समझ सो जाते हैं।

कैसे कोई मारे-मरे
देश की सरहदों के लिए!
जहाँ नेता हो या जनता
अपने ही जवानों के राशन और कफ़न का हक भी डकार जाते हैं।

ये देश हे मेरा और लोग भी मेरे अपने हैं,
पर,
कहूँ भी तो किस से अब
होंठ अल्फाज कम और आंसू ज्यादा पिते हैं
एक आस सी थी नयी पीढ़ी से मगर,
बड़ा अजब देश प्रेम हे इनका!!!
जो जस्ने आजादी को पब डिस्को में मानते हैं।
बियर के घूंट से तर गले से...
जय हिंद जय हिंद के नारे लगते हैं।

आज़ादी,
की लड़ाई की जड़ो-जहद २०० सालों तक चली,
सायद उसी की थकन हे,
के हम पिछले ६४ सालों से
बस सो ही रहे हैं
- Krishna Kumar Vyas

Friday, July 1, 2011

एक आम इन्सान का सफर


आओ चलो करें तय..
एक आम इंसान का सफ़र..

जब जब घर से निकलता..
माथे पर तिलक या बाजुओं में फकीर के तावीज़ में
माँ के भरोसे का संग संग चलता..असर |
ऐसे एक आम इंसान का सफ़र.

सड़कों से सॅटी दीवारों पर चिपके फिल्मी पोस्टरों के नायक में खुद को ढूंढता.
कानो को भाए नुक्कड़ पर गूँजता रेडीओ का मध्यम स्वर...
दुनिया को अपने पेरो से पीछे छोड़ने का कर के प्रण
हर दिन चल पड़ता है जो..
मिटाने किस्मत मे लिखी विवस्ता के कहर का असर ...
ऐसे एक आम इंसान का सफ़र..

आओ चलो करें तय..एक आम इंसान का सफ़र..

घर मे बचों की भीड़ .. तो बाहर लोगों की...
तन्हाइयों में भी जिसे चैन मिलता ऩही 
की घेरे रहती है यहाँ भी तो..
चिंता...
रोटी कपड़े और मकान की...
ऐसे एक आम इंसान का सफ़र.
बच्चों की मासूम ख्वाईसैं हों या फिर .. बीवी के खाली हाथ
गाँव से आई पिता की मजबूरियों की चिट्ठी
कर दे पूरी ये भी हर आस जो भी है अधूरी .. 
आसू बिक सकते बाजार मे काश ! जो इसके भी अगर..
हाँ यही है एक आम इंसान का सफ़र...

आओ चलो करें तय..एक आम इंसान का सफ़र..

ऐसा नही की ..
नही तड़प उठता है, इसका दिल भी
जब जब सुने...
भरस्टचार के किस्से...
बेआबरू होती माँ - बहनो की बाते..
खोलता है खून इसका भी
हुंकार भर ले ये भी
मगर...

अपने, अपनों की सलामती की चाह में..
घुट गयी है .. दब गयी है..
ये क्रांति वाली हलक...

सामाजिक मुद्दे उठाते अख़बारों को समेटे
रद्दी वालों से करता मोल भाव...
ऐसे आम इंसान का सफ़र..

थक कर मौत में सहारा ढून्डता..
पर अगले ही पल..
जिंदगी के लिए दौड़ना पड़ता है जिसे चारो पहर..

आओ चलो करें तय..एक आम इंसान का सफ़र..
By - Krishna Kumar Vyas
May 16, 2010