jeevan ki raah ke kuch palon ka anubhav...किस्मत के हाथों बँधे इन निगाहों ने ना जाने क्या क्या देखा.. पर देखा जिसे बस खूने जिगर पीते देखा, पहले रोते थे मरने वालों पर... अब आँखें छलक गयी जब किसी को जीते देखा| Kismat ke hathon bandhe in nigahon ne, na jaane kya kya dekha... par dekha jise bas khune jigar pite dekha... pahle rothe the marne valon par.. ab aankhain chalak gayi jab kisi ko jite dekha
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Wednesday, December 14, 2011
Tuesday, November 29, 2011
जिस ज़मीन के टुकड़े के लिए
जिस ज़मीन के टुकड़े के लिए
हम नर मुंडो को बोते हैं बीज की तरह और
खून की नदियाँ बहा देते हैं...
कभी गर उस पर कुछ उगा भी..!!
तो वो चीखों और आहों के सिवा...
और क्या होगा...!!
Jis Jamin Ke Tukde Ke Liye
Hum Nar Mundo Ko bote hain bij ki tarah our
khun ki nadiyan baha dete hain...
kabhi gar us par kuch uga bhi...
to vo chikhon or aahon ke siva
our kya hoga..!!
2 lines From My Poem : Sarhad par jo mara hey
By: Krishna Kumar Vyas
Monday, July 4, 2011
बस सो ही रहे हैं...
की लड़ाई की जदो-जहद २०० सालों तक चली,
सायद उसी की थकन हे,
के हम पिछले ६४ सालों से
बस सो ही रहे हैं
इंडिया सब्द के आगे भारत सब्द अब
एक दुसरे देश सा लगता हे,
कोश्ती हे जनता अपने नेताओं को भ्रस्टाचार के नाम पर,
और अपने ही नाकारा बचों के लिए रिश्वत देते इठलाते हैं,
अजब देश हे जहाँ हिंदी बोलने पर
स्कूल में बचे मार खाते हैं।
थकन बहोत हे २०० सालों के गुलामी की
ईसी लिए वोटिंग के दिन को हम
छुटी समझ सो जाते हैं।
कैसे कोई मारे-मरे
देश की सरहदों के लिए!
जहाँ नेता हो या जनता
अपने ही जवानों के राशन और कफ़न का हक भी डकार जाते हैं।
ये देश हे मेरा और लोग भी मेरे अपने हैं,
पर,
कहूँ भी तो किस से अब
होंठ अल्फाज कम और आंसू ज्यादा पिते हैं
एक आस सी थी नयी पीढ़ी से मगर,
बड़ा अजब देश प्रेम हे इनका!!!
जो जस्ने आजादी को पब डिस्को में मानते हैं।
बियर के घूंट से तर गले से...
जय हिंद जय हिंद के नारे लगते हैं।
आज़ादी,
की लड़ाई की जड़ो-जहद २०० सालों तक चली,
सायद उसी की थकन हे,
के हम पिछले ६४ सालों से
बस सो ही रहे हैं
- Krishna Kumar Vyas
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